जब कभी नया देश बनता हैं तो उसे अपने हित में अतंगर्त व्यवस्था बनाने का पूरा अधिकार होता हैं और उन्हें बनाना भी चाहिए अपने बेहतर कल के लिए । किंतु हमारे नेताओं ने अंग्रेजो की बनायीं नीतियों कोही अपना धर्म मानकर आगे बढाया और अभी भी बढा रहा हैं । यह सब कायदे-कानून अंग्रेजो ने हमारे शोषण एवं हमें लुटने हेतु बनाये थे, इसमे कोई दो राय नहीं हो सकती । अंग्रेजो ने हमेशा जातीय मुद्दों पर हमें लड़ाया और वैसे कानून भी बनाये।
गांधीजी ने कांग्रेसियों से अनुरोध किया था की स्वतंत्र्यता के बाद कांग्रेस का विसर्जन कर दिया जाये । क्योंकि गांधीजी मानते थे की यह विजय भारत के नागरिकों की हैं नाकि कांग्रेस की । कांग्रेस का विसर्जन तो नहीं हुआ, लेकिन गांधीजी का खात्मा जरुर हो गया । गांधीजी को किसने मारा यह कोई पहेली नहीं हैं, किंतु किसने मरवाया यह अभी न सुलझी हुई पहेली हैं ।
सभी राष्ट्रप्रेमी नेता या तो १९४७ से कुछ साल पहले या कुछ साल बाद त्याग दिए/मर गए । इस विषय में नाही कोई सवाल पूछता हैं नाही संदेह व्यक्त करता हैं । कितनी कम जानकारी हैं हमें इन सब चीजो के विषय में और जो हैं वह भी लगभग आधा सच ।
हमें पाठशाला में भी पढाया जाता हैं की सवाल मत पूछो बस जितना बताया उतना करो । यह निति अंग्रेजो ने अपनाई थी क्योंकि उन्हें भारतीयों के रूप में अंग्रेज चाहिए थे । अंग्रेजो की दी गयी इस शिक्षा का परिणाम वैसाही हुआ जैसा उन्होंने चाहा था, स्वतंत्रता के बाद के हमारे लुटेरे नेताओं ने लूटने में अंग्रेजों को भी पीछे छोड़ दिया।
और इस लूटकी झलक हैं निचे का ये बड़ा विज्ञापन पत्र। सामने आये आकड़ों के हिसाब से भ्रष्ट अधिकारी और नेताओं ने मिलकर रु. ९१०.६ लक्ष करोड़ की पूंजी लुटी हैं।

१९४८ में शुरू हुआ लूटने का सिलसिला अभी भी पुरे जोरों से जारी हैं । जैसे लुटेरों से हमें कभी आज़ादीही न मिली हो ।
आज हमारे अपनेही नेतागण हमसे अंग्रेजोसे भी बद्तर व्यवहार कर रहे हैं ।
जय भारत!
सरफरोशो ने जिसे लहू देके सींचा, हैं ऐसे गुलशन को उजड़ने से बचा लो यारों ।
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