॥ कृषी देश ॥

भारत नवनिर्माणाची आस आणि त्यादिशेने प्रवास

“सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं”

Posted by संदीप नारायण शेळके on August 19, 2011

कवी दिनकरजी ने यह कविता भारत के गणतंत्र दिन के अवसर पर लिखी थी । २६ जनवरी १९५१ को भारत ने अपना पहला गणतंत्र दिन मनाया तब दिनकरजी ने यह बेहद सुंदर कविता राष्ट्र को समर्पित की । उस समय भारत की जन्संन्ख्या ३३ करोड़ थी, आज हम १२१ करोड़ से भी ज्यादा हैं । आज इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध  में जब आम नागरिक राष्ट्रहित में रास्ते पर उतर आये हैं, तब यह कविता फिरसे वही रोमांच दिलाती हैं ।

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सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं ।

जनता? हाँ, मिट्टी की अबोध मुरते वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहने वाली,
जब अंग अंग में लगे साँप हो चूस रहे,
तब भी न मुँह खोल दर्द कहने वाली ।

लेकिन, होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपकुल हो भृकुटी चढ़ती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं ।

हुँकारों से महलों की नीव उखड जाती,
साँसों के बल से ताज हम में उड़ता हैं,
जनता की रोके राह समय में ताब कहाँ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता हैं ।

सबसे विरत जनतंत्र जगत का आ पहुँचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंघासन तैयार करों,
अभिषेक आज रजा का नहीं, प्रजा का हैं,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो ।

आरती लिए तू किसे ढूंढ़ता हैं मुरख,
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में
देवता कही सड़कों पर मिट्टी तोंड रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में ।

फावड़े और हल राजदंड बनाने को हैं,
धूसरता सोने से शृंगार सजाती हैं,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो की जनता आती हैं ।

-कवी रामधारी सिंह दिनकर

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